BJP का दावा कि नेहरू ने 1937 में ‘Vande Mataram’ की देवी दुर्गा वाली पंक्तियाँ हटाईं। जानिए, क्या है इस ऐतिहासिक विवाद का सच।
भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ (Vande Mataram) को लेकर एक बार फिर राजनीति गरमा गई है। BJP ने आरोप लगाया है कि 1937 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गीत की देवी दुर्गा वाली पंक्तियाँ हटा दी थीं ताकि मुस्लिम समुदाय नाराज़ न हो। अब सवाल ये उठ रहा है — क्या सचमुच वंदे मातरम का मूल रूप कभी बदला गया था, या ये सिर्फ एक राजनीतिक व्याख्या है?
वंदे मातरम’ (Vande Mataram) की उत्पत्ति
‘वंदे मातरम’ का सृजन बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में किया था।
यह रचना 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल की गई, जिसमें भारतमाता की आराधना को देवी दुर्गा के रूप में दिखाया गया।
गीत में कुल 6 स्तोत्र (stanzas) हैं, जिनमें शुरुआती दो देशप्रेम पर केंद्रित हैं, जबकि आगे के हिस्सों में देवी-दुर्गा और धार्मिक प्रतीकों का वर्णन मिलता है।
1937 का ऐतिहासिक संदर्भ (‘Vande Mataram’ विवाद)
ब्रिटिश काल में जब वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम का नारा बना, तब मुस्लिम लीग ने इसके कुछ अंशों पर आपत्ति जताई —
क्योंकि आनंदमठ में यह गीत एक ऐसे विद्रोह से जुड़ा था जिसे कुछ लोग “सांप्रदायिक संघर्ष” के रूप में देखते थे।
इसी दौरान 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में यह प्रस्ताव आया कि गीत के केवल पहले दो स्तोत्रों को आधिकारिक रूप से अपनाया जाए —
ताकि इसे सभी धर्मों के लोग स्वीकार कर सकें।
नेहरू का पत्र और Vande Mataram विवाद का जन्म
BJP प्रवक्ता सी.आर. केसवन ने हाल ही में दावा किया है कि नेहरू ने 1 सितंबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस को लिखे पत्र में कहा था कि
“पूरा गीत मुस्लिम समुदाय को चिढ़ा सकता है, इसलिए केवल शुरुआती हिस्से को अपनाया जाए।”
हालांकि इन पत्रों का पूरा टेक्स्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, जिससे ये बयान राजनीतिक व्याख्या माने जा रहे हैं।
1950 में मिली संवैधानिक मान्यता
आजादी के बाद 1950 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की कि “जन गण मन” राष्ट्रगान होगा, जबकि “वंदे मातरम” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाएगा —
और दोनों को समान सम्मान मिलेगा।
उस समय भी केवल पहले दो स्तोत्र ही आधिकारिक रूप से अपनाए गए थे।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण और सार्वजनिक प्रतिक्रिया (‘Vande Mataram’ विवाद)
इतिहासकारों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि
1937 का निर्णय उस दौर की राजनीतिक व्यावहारिकता (political pragmatism) का परिणाम था,
ना कि किसी एक व्यक्ति या धर्म को खुश करने का।
दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रोफेसर डॉ. अनामिका वर्मा कहती हैं —
“कांग्रेस के नेताओं ने कोशिश की थी कि वंदे मातरम को एक सर्व-धर्म स्वीकार्य प्रतीक बनाया जाए।
उस समय भारत का स्वतंत्रता आंदोलन एकता पर आधारित था, इसलिए उन्होंने दो स्तोत्रों तक सीमित रखने का फैसला किया।”
वहीं राजनीतिक विश्लेषक आलोक रंजन का मानना है कि
“BJP का यह आरोप उस समय आया है जब केंद्र सरकार वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मना रही है।
इसलिए इसे सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी माना जा सकता है।”
सोशल मीडिया पर भी यह विवाद तेजी से फैल गया है —
कुछ लोग नेहरू पर “इतिहास तोड़ने-मरोड़ने” का आरोप लगा रहे हैं,
तो कई यूज़र कह रहे हैं कि “राष्ट्रीय प्रतीक को धर्म से जोड़ना गलत है।”
प्रभाव और भविष्य की दृष्टि
यह (‘Vande Mataram’ विवाद) विवाद भारत के सांस्कृतिक विमर्श (cultural discourse) को दो हिस्सों में बाँट देता है —
एक तरफ वे लोग हैं जो वंदे मातरम को “धार्मिक आराधना” से जोड़कर देखते हैं,
दूसरी तरफ वे जो इसे “राष्ट्रीय भावना का प्रतीक” मानते हैं।
राजनीतिक स्तर पर, BJP इस (‘Vande Mataram’ विवाद) मुद्दे को “नेहरू युग की गलतियों” के उदाहरण के रूप में पेश कर रही है,
जबकि कांग्रेस इसे “सद्भाव और समावेश की भावना” बताती है।
आने वाले महीनों में जब वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होंगे, संभावना है कि इस विषय पर नई अकादमिक चर्चाएँ और दस्तावेज़ी प्रमाण सामने आएँगे —
जो यह साफ़ कर सकें कि 1937 का फैसला किन परिस्थितियों में और किसके नेतृत्व में हुआ था।
तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि 1937 में कांग्रेस ने केवल पहले दो स्तोत्रों को अपनाया, क्योंकि बाद के हिस्सों को लेकर धार्मिक आपत्तियाँ थीं। परंतु यह कहना कि नेहरू ने व्यक्तिगत रूप से देवी-दुर्गा वाली पंक्तियाँ हटाईं, वर्तमान में उपलब्ध साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता।
वंदे मातरम आज भी भारत की आत्मा में बसता है —
चाहे उसकी पंक्तियाँ दो हों या छह,
उसका अर्थ एक ही है —
“भारत माता की वंदना, और देश के प्रति अटूट समर्पण।”
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