अंबिकापुर का गार्बेज कैफे प्लास्टिक वेस्ट के बदले भोजन देता है। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में सराहा। जानें इस पहल का सामाजिक और पर्यावरणीय असर।
अंबिकापुर का गार्बेज कैफे – जब कचरा बनता है भोजन
छत्तीसगढ़ का अंबिकापुर शहर इन दिनों पूरे देश में चर्चा में है। यहाँ का ‘गार्बेज कैफे’ न केवल सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से अनूठा है, बल्कि गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए एक बड़ी राहत भी है।
26 अक्टूबर, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी 127वीं ‘मन की बात’ में इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह कैफे न केवल भूख मिटाता है बल्कि कचरे को भी एक मूल्यवान संसाधन में बदल देता है।
गार्बेज कैफे कैसे काम करता है?
यह पहल 2019 में अंबिकापुर नगर निगम (AMC) द्वारा शुरू की गई थी। इसकी खासियतें इस प्रकार हैं:
- प्लास्टिक वेस्ट बदले भोजन: एक किलो प्लास्टिक कचरे के बदले यहाँ एक पूरा खाना और आधा किलो कचरे के बदले नाश्ता दिया जाता है।
- स्वस्थ और संतुलित भोजन: चावल, दाल, दो प्रकार की सब्जियाँ, रोटी, सलाद और अचार शामिल हैं।
- सुलभ स्थान: शहर के मुख्य बस स्टैंड के पास स्थित होने के कारण रैगपिकर और गरीब लोग आसानी से यहाँ आ सकते हैं।
इस पहल का नारा है: “जितना अधिक कचरा, उतना बेहतर स्वाद।” यह नारा लोगों को जागरूक करता है कि कचरा केवल फालतू नहीं, बल्कि मूल्यवान संसाधन है।
पीएम मोदी का संदेश
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि छोटे-छोटे बदलाव से बड़ा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने सभी नागरिकों से सस्टेनेबल प्रैक्टिसेस अपनाने की अपील की।
- “जब हम रोजमर्रा की आदतों में बदलाव लाते हैं, तो समाज और पर्यावरण दोनों को फायदा होता है।”
- पीएम मोदी ने गार्बेज कैफे को यह संदेश देने वाला उदाहरण बताया कि कचरे को अवसर में बदला जा सकता है।
सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव
गार्बेज कैफे सिर्फ भूख मिटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज में जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
- एनजीओ और स्वयं सहायता समूहों का योगदान: कचरा संग्रह और वर्गीकरण में इन्हें शामिल किया गया।
- प्लास्टिक का पुनः उपयोग: प्लास्टिक से बने उत्पादों का सड़क निर्माण में उपयोग किया जा रहा है।
- शिक्षा और जागरूकता: बच्चे और छात्र इस पहल को अपने स्कूल प्रोजेक्ट्स और सामाजिक शिक्षा में शामिल कर रहे हैं।
इस तरह, गार्बेज कैफे ने दिखाया कि सामाजिक सेवा और पर्यावरण संरक्षण एक साथ संभव हैं।
लोकप्रिय प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया ट्रेंड
सोशल मीडिया पर इस पहल को लेकर उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं:
- “यह पहल समाज और पर्यावरण दोनों के लिए प्रेरणादायक है।”
- “मैं अपने शहर में भी ऐसा कैफे खोलना चाहता हूँ।”
- “कचरे को मूल्यवान संसाधन में बदलना सच में कमाल की सोच है।”
लोगों का मानना है कि इस तरह के मॉडल देश के अन्य शहरों के लिए भी उदाहरण बन सकते हैं।
त्योहारों और संस्कृति का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने इस एपिसोड में छठ पूजा की बधाई भी दी। उन्होंने कहा कि त्योहारों में पर्यावरण और सांस्कृतिक मूल्यों का ध्यान रखना जरूरी है। गार्बेज कैफे जैसी पहल समाज को यह दिखाती है कि परंपरा और संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
अंबिकापुर का गार्बेज कैफे यह साबित करता है कि छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। यह पहल न केवल गरीबों को पोषण देती है, बल्कि समाज में जिम्मेदारी और जागरूकता की भावना भी पैदा करती है।
संदेश साफ है:
“कचरे को बेकार मत समझो, उसे अवसर समझो और समाज व पर्यावरण के लिए योगदान दो।”
यह पहल न केवल अंबिकापुर बल्कि पूरे भारत के लिए एक प्रेरक मिसाल बन चुकी है।





