लखनऊ यूनिवर्सिटी के चमकते चेहरे के पीछे की सच्चाई: बकाया वेतन, भ्रष्टाचार और सिस्टम की जंग

लखनऊ यूनिवर्सिटी के अंदर बकाया वेतन, Samarth Portal की तकनीकी दिक्कतें और निर्माण विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों ने हंगामा मचा दिया है। पढ़ें अंदर की पूरी सच्चाई जो दिखाती है कि LU का चमकता चेहरा असल में किन संघर्षों से गुजर रहा है।

LU – एक ऐतिहासिक संस्थान, लेकिन अंदर बढ़ता अंधेरा

लखनऊ यूनिवर्सिटी (Lucknow University) — यह नाम सुनते ही उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का गौरवशाली इतिहास याद आता है।
1921 में स्थापित यह विश्वविद्यालय एक समय में ज्ञान का तीर्थ” माना जाता था। आज भी इसकी प्रतिष्ठा और NAAC A++ ग्रेड इसे देश की शीर्ष यूनिवर्सिटियों में खड़ा करती है।

लेकिन, इस चमकते ताज के नीचे दरारें गहराती जा रही हैं। जहां एक ओर यूनिवर्सिटी डिजिटल सिस्टम, नए निर्माण और आधुनिकीकरण का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बकाया वेतन, भ्रष्टाचार, और तकनीकी अव्यवस्था ने इसकी नींव हिला दी है।

शिक्षकों का बकाया वेतन – मेहनत की कीमत अधूरी

Hindustan Times की एक रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ यूनिवर्सिटी के करीब 3,000 से अधिक शिक्षकों को पिछले दो से तीन सत्रों से विभिन्न कार्यों का भुगतान नहीं मिला। इन कार्यों में प्रश्नपत्र बनाना, कॉपी जांचना, इनविजिलेशन (परीक्षा में निगरानी), और व्यावहारिक परीक्षाएं शामिल हैं।

आंकड़ों के मुताबिक:

  • ₹1.65 करोड़ इनविजिलेशन का बकाया,
  • ₹70 लाख मूल्यांकन (evaluation) का बकाया।

यह रकम केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि हजारों शिक्षकों की मेहनत और उम्मीदों की कहानी हैं। कई अध्यापक बताते हैं कि महीनों की कोशिशों के बाद भी उन्हें सिर्फ “वादा” मिलता है, वेतन नहीं। कुछ को भुगतान तब मिलता है जब वे किसी अधिकारी को “लगातार याद” दिलाते हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डालती है, बल्कि यूनिवर्सिटी की साख पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है।

एक तरफ सरकार “गुणवत्ता आधारित शिक्षा” की बात करती है, दूसरी ओर शिक्षक अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

निर्माण विभाग में भ्रष्टाचार – ईंटों से ईमान तक की दरार

अब बात करते हैं यूनिवर्सिटी के निर्माण विभाग की — हाल ही में Navbharat Times और Amar Ujala में छपी रिपोर्ट्स ने सभी को चौंका दिया। LU के निर्माण विभाग के अधीक्षक प्रो. डी.के. सिंह ने इस्तीफा दे दिया, जब उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे।

रिपोर्ट्स के अनुसार,

  • बाजार में ₹8 प्रति ईंट की दर से मिलने वाली ईंटें यूनिवर्सिटी में ₹240 प्रति ईंट के हिसाब से खरीदी गईं।
  • इलेक्ट्रिक केबल्स जो ₹931 प्रति मीटर की थीं, उन्हें कई गुना महंगे दामों पर खरीदा गया।

ऐसे आरोप सिर्फ आर्थिक घोटाले नहीं हैं — यह उस विश्वास का हनन है जिस पर शिक्षा संस्थान टिके होते हैं।
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जांच के आदेश दिए हैं और प्रो. सिंह की जगह डॉ. श्यामलेश कुमार तिवारी को नया निर्माण अधीक्षक नियुक्त किया गया है।
पर सवाल वही है —
क्या यह सिर्फ इमेज बचाने का कदम है या वाकई में सुधार की शुरुआत?

Samarth Portal – डिजिटल सपनों का वास्तविक संघर्ष

इसी बीच, यूनिवर्सिटी के Samarth Portal से जुड़ी एक और समस्या सामने आई। LU प्रशासन ने अपने सभी संबद्ध कॉलेजों को आदेश दिया था कि वे पहले सेमेस्टर के छात्रों का डेटा Samarth Portal पर अपलोड करें। मकसद था कि सारे रजिस्ट्रेशन, परीक्षा और प्रशासनिक कार्य ऑनलाइन पारदर्शी ढंग से हों।

परंतु ज़मीनी सच्चाई कुछ और निकली। कई कॉलेजों में non-teaching staff की कमी थी, वहीं पोर्टल बार-बार हैंग हो रहा था।
तकनीकी खामियों के कारण डेटा अपलोड न होने पर कॉलेजों ने समय सीमा बढ़ाने की मांग की। अंततः LU प्रशासन को 31 अक्टूबर तक डेडलाइन बढ़ानी पड़ी।

यह घटना यह दर्शाती है कि डिजिटल इंडिया का सपना, बिना जमीनी तैयारी के, केवल कागजों पर सुंदर लगता है। जब तक कॉलेजों में पर्याप्त तकनीकी सहयोग, स्टाफ ट्रेनिंग और सर्वर सपोर्ट नहीं होगा, तब तक ऐसे सिस्टम “ease of governance” के बजाय “pain of governance” बन जाएंगे।

प्रशासन और सिस्टम की जंग – जिम्मेदारी किसकी?

LU की इन तीनों घटनाओं — बकाया वेतन, Samarth Portal की गड़बड़ियां और निर्माण घोटाला — से यह साफ है कि समस्या जड़ में है। सिस्टम सुंदर है, लेकिन संवेदनहीन हो गया है। शिक्षक मेहनत कर रहे हैं, कर्मचारी संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन निर्णय लेने वाले या तो चुप हैं या फाइलों के पीछे छिपे हैं।

LU के पास A++ ग्रेड है, आधुनिक कैंपस है,
लेकिन इन सबके पीछे अगर सिस्टम कमजोर हो, तो यह ग्रेड सिर्फ दीवारों पर टंगी एक सजावट रह जाती है।

छात्रों और समाज पर असर

जब एक शिक्षक को उसका वेतन समय पर नहीं मिलता, तो उसकी ऊर्जा छात्रों तक नहीं पहुंचती। जब एक डिजिटल सिस्टम फेल होता है, तो छात्र का रजिस्ट्रेशन और परीक्षा प्रक्रिया बाधित होती है। और जब एक विभाग में भ्रष्टाचार की गंध आती है, तो पूरा संस्थान अविश्वास की चादर में लिपट जाता है।

शिक्षा केवल किताबों का ज्ञान नहीं है, यह ईमान, अनुशासन और पारदर्शिता का प्रतीक है। अगर यही तीनों चीजें कमजोर पड़ जाएं, तो फिर डिग्रियां सिर्फ कागज बनकर रह जाती हैं।

फिर भी, उम्मीद बाकी है। LU का इतिहास गौरवशाली रहा है, और ऐसे संस्थानों की आत्मा इतनी जल्दी नहीं मरती। जरूरत है एक ऐसी नेतृत्व क्षमता की, जो जवाबदेही को प्राथमिकता दे, और एक ऐसे सिस्टम की, जो शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों — तीनों को साथ लेकर चले।

अगर प्रशासन पारदर्शी तरीके से बकाया क्लियर करे, भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई करे, और डिजिटल सुधारों को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाए, तो लखनऊ यूनिवर्सिटी फिर से “ज्ञान की राजधानी” बन सकती है।