पुणे की डायना पुंडोले ने 2024 में इतिहास रच दिया—दो बच्चों की माँ और पूर्व शिक्षक ने भारत की पहली महिला के रूप में नेशनल सैलून कार रेसिंग चैम्पियनशिप जीतकर मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में नया अध्याय लिखा।
“Teacher से Racer तक” — डायना पुंडोले की Inspirational Journey
कभी क्लासरूम में बच्चों को English पढ़ाने वाली डायना पुंडोले ने शायद खुद नहीं सोचा था कि एक दिन वही Classroom छोड़कर कार के स्टीयरिंग व्हील के पीछे बैठेगीं — और पूरी दुनिया को दिखाएंगी कि सपने कभी भी direction बदल सकते हैं, बस गियर लगाने की हिम्मत चाहिए।
पुणे की रहने वाली डायना पुंडोले, दो बच्चों की माँ हैं। लेकिन 2024 में उन्होंने ऐसा काम कर दिखाया जिससे वो भारत की पहली महिला बन गईं, जिन्होंने National Saloon Car Racing Championship का खिताब अपने नाम किया।
यानी उन्होंने न सिर्फ रेस जीती, बल्कि महिलाओं के लिए मोटरस्पोर्ट्स में नई राह भी खोली।
एक कॉल जिसने सब कुछ बदल दिया
साल था 2018। देशभर में “Women in Motorsport” नाम से एक टैलेंट हंट चलाया गया था। डायना ने बस एक curiosity में फॉर्म भर दिया — “चलो ट्राय करते हैं।”
पर किसे पता था कि यही एक छोटा-सा फैसला उनके जीवन की फुल-थ्रॉटल शुरुआत साबित होगा! लगभग 200 महिलाओं में से डायना टॉप-6 फाइनलिस्ट में चुनी गईं। और यहीं से उनकी रेसिंग की असली जर्नी शुरू हुई।
परिवार, डर और determination की रेस
हर सफलता के पीछे कहानी होती है — और डायना की कहानी सिर्फ रेसिंग की नहीं, संतुलन की रेस है।
एक तरफ दो छोटे बच्चे, दूसरी तरफ रेसिंग ट्रैक की तैयारी, फिटनेस, प्रैक्टिस, ट्रैवल —
लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
डायना कहती हैं —
“मेरी असली रेस मेरे अंदर थी — डर, संदेह और समाज की सोच से आगे निकलना।”
उनके पति और परिवार ने उन्हें पूरा सपोर्ट दिया। जहाँ कई लोग सवाल करते थे कि “एक माँ रेसिंग ट्रैक पर क्या करेगी?”, वहीं उन्होंने जवाब दिया — “सब कुछ।”

2024 — वो साल जब इतिहास लिखा गया
MRF MMSC FMSCI Indian National Car Racing Championship 2024, यानी भारत की सबसे प्रतिष्ठित सैलून-कार रेसिंग।
पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए खुली इस चैम्पियनशिप में डायना ने न सिर्फ हिस्सा लिया — बल्कि खिताब जीत लिया।
इस जीत के साथ डायना बनीं —
पहली भारतीय महिला, जिन्होंने किसी नेशनल लेवल सैलून-कार रेसिंग चैम्पियनशिप में टाइटल जीता।
यह कोई छोटी बात नहीं थी — उनके सामने अनुभवी male racers, हाई-परफॉर्मेंस मशीनें, और ट्रैक का हर curve एक नई चुनौती थी।
लेकिन डायना ने हर बार अपनी कार को सही मोड़ पर मोड़ा — और इतिहास की लाइन क्रॉस की।
“माँ भी Racer हो सकती है” — एक सोच का बदलाव
डायना पुंडोले की जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि एक message थी — कि ‘माँ होना कमजोरी नहीं, ताकत है।’
उन्होंने साबित किया कि महिलाओं के सपनों की कोई उम्र नहीं होती। ना ही समाज की कोई दीवार इतनी ऊँची है जिसे हिम्मत पार ना कर सके।
उनकी कहानी उन हज़ारों महिलाओं के लिए इंस्पिरेशन है जो career बदलने से डरती हैं, या सोचती हैं कि “अब देर हो गई।”
Motorsport का नया चेहरा
डायना की जीत से भारत में महिला मोटरस्पोर्ट्स को नई पहचान मिली है। अब ज्यादा young girls इस field को अपनाने की सोच रही हैं। FMSCI (Federation of Motor Sports Clubs of India) भी अब “Women in Motorsport” प्रोग्राम को और आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
Diana खुद अब नई रेसर्स को मेंटर करने की बात कह चुकी हैं —
“अगर मेरी कहानी किसी एक लड़की को स्टार्ट लाइन तक पहुंचा सके, तो वही मेरी सबसे बड़ी जीत होगी।”
Future के लिए Roadmap
2025 में डायना इंटरनेशनल सर्किट्स में उतरने की तैयारी कर रही हैं। उनका सपना है कि भारत का नाम FIA-approved circuits पर गूंजे। उनका फोकस अब सिर्फ जीत पर नहीं, बल्कि महिला सहभागिता बढ़ाने पर भी है।
Conclusion — सपनों की कोई उम्र नहीं होती
डायना पुंडोले की कहानी हमें ये सिखाती है कि जीवन में गियर बदलने में कभी देर नहीं होती।
Teacher से Racer बनने का सफर बताता है कि आपकी पहचान वही है जो आप खुद बनाते हैं, ना कि जो दुनिया आप पर थोपती है।
उनकी रेस सिर्फ ट्रैक पर नहीं, हर उस महिला के दिल में जारी है जो अपने डर के खिलाफ गाड़ी स्टार्ट कर रही है।
जब दुनिया कहे “धीरे चलो”,
तो बस accelerator दबाओ — क्योंकि कहानी की असली रेस वहीं से शुरू होती है।
हर कोई अपनी ज़िंदगी का “Race Track” खुद बनाता है। बस हिम्मत चाहिए — और एक डायना पुंडोले-सी स्पीड।





