दिल्ली सरकार ने सचिवालय और CM रेखा गुप्ता के ऑफिस में 15 एयर प्यूरीफायर लगाने के लिए ₹5.5 लाख का टेंडर जारी किया है। जनता सवाल कर रही है – साफ हवा सिर्फ नेताओं के लिए? जानिए पूरी रिपोर्ट मानवीय एंगल के साथ।
दिल्ली की हवा फिर ज़हरीली – लेकिन अब नेता सांस लेंगे साफ!
दिल्ली में ठंड के साथ एक बार फिर प्रदूषण का ज़हर घुलने लगा है। आसमान धुंध से ढका है, AQI “गंभीर” श्रेणी में पहुंच चुका है, और आम लोग सांस लेने में दिक्कत महसूस कर रहे हैं।
इसी बीच दिल्ली सरकार के सचिवालय में 15 नए एयर प्यूरीफायर लगाने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
सरकारी टेंडर के मुताबिक,
“RMO E&M Services at Delhi Sachivalaya during 2025-26 (SH:- Supply & fixing of Air Purifiers at Various locations in Delhi Sachivalaya building).”
इस टेंडर में साफ़ लिखा है कि सचिवालय भवन में 15 एयर प्यूरीफायर लगाए जाएंगे, जिन पर लगभग ₹5.5 लाख का खर्च आएगा।
जनता में गुस्सा – ‘साफ हवा सिर्फ नेताओं के लिए?’
जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर बवाल मच गया।
लोगों ने सवाल उठाया कि जहां आम जनता ज़हरीली हवा में सांस ले रही है, वहां सरकार अपने दफ्तरों के लिए साफ हवा खरीद रही है।
एक यूज़र ने तीखा लिखा —
“दिल्ली में बच्चे दम तोड़ रहे हैं, लेकिन नेताओं के कमरों में हवा फिल्टर होगी!”
विपक्षी पार्टियों ने भी मौका नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि सरकार जनता को मास्क और सलाह दे रही है, लेकिन खुद एयर प्यूरीफायर में सांस लेगी।
टेंडर का सच – खर्च वाकई कितना है?
अगर सरकारी रिकॉर्ड देखें तो टेंडर की कुल लागत ₹5,45,175 बताई गई है।
मतलब, हर एक एयर प्यूरीफायर की औसत कीमत करीब ₹36,000 पड़ती है।

सरकार का कहना है कि ये प्यूरीफायर सचिवालय के कई विभागों में लगाए जाएंगे, जिसमें मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कार्यालय भी शामिल है।
सरकार की सफाई – “ये दिखावा नहीं, जरूरत है”
दिल्ली सरकार के एक अधिकारी ने मीडिया को बताया —
“सचिवालय में सैकड़ों अधिकारी, कर्मचारी और आने-जाने वाले लोग काम करते हैं। प्रदूषण का असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। एयर प्यूरीफायर लगाना एक प्रशासनिक आवश्यकता है, कोई विलासिता नहीं।”
सरकार का यह भी कहना है कि वह जनता के लिए भी कई कदम उठा रही है — जैसे anti-smog guns, पानी का छिड़काव, और GRAP नियमों का पालन।
जनता का दर्द – “हमारे हिस्से की हवा कौन साफ करेगा?”
लेकिन जनता के लिए यह दलीलें कितनी कारगर हैं?
दिल्ली में आज भी लाखों लोग खुले में काम करते हैं, सड़क किनारे रहते हैं या बसों में सफर करते हैं।
उनके पास ना एयर प्यूरीफायर है, ना मास्क की सुविधा।
एक महिला ने ट्वीट किया —
“हम अपने बच्चों के लिए साफ हवा नहीं खरीद सकते। क्या सरकार को सिर्फ अपने ऑफिस की हवा की चिंता है?”
यह बयान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस दिल्ली की सामूहिक आवाज़ है जो हर साल धुएं में घुटती है।
दिल्ली की हवा – एक सालाना ‘इमरजेंसी’
हर साल अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली गैस चैंबर बन जाती है।
सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन हालात जस के तस रहते हैं।
सवाल ये है कि क्या एयर प्यूरीफायर लगाकर हम प्रदूषण से लड़ सकते हैं?
शायद नहीं।
जब तक सरकार, उद्योग और जनता मिलकर ठोस कदम नहीं उठाएंगे — जैसे कि वाहनों का नियंत्रण, स्टबल बर्निंग रोकना और ग्रीन जोन बढ़ाना — तब तक दिल्ली की हवा में जहर घुलता रहेगा।
निष्कर्ष: साफ हवा का हक सबका है, सिर्फ सत्ता का नहीं
दिल्ली सचिवालय में एयर प्यूरीफायर लगाना एक छोटा कदम हो सकता है, लेकिन यह बड़ा सवाल छोड़ता है —
क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच रही है या सच में समाधान की दिशा में बढ़ रही है?
क्योंकि याद रखिए —
“सांस लेना अधिकार है, सुविधा नहीं।”
और यह अधिकार हर दिल्लीवाले का है, सिर्फ उन कमरों का नहीं जहां सत्ता की कुर्सियाँ रखी हैं।





